कितनी मंज़िल तुमने बाँधी
बस तुमने कूटी है चांदी
तब के नेहरू अब के गाँधी
दोनों से पूछ रही आंधी
तब भगत सिंह सुखदेव
राजगुरु बरी नहीं हो पाए थे
क्यूं गोरों की सरकारों पर
तुम जोर नहीं डलवाए थे
अब अफ़ज़ल से शर्मिन्दा जो
तुम उन पर मरहम लगाते हो
जो टुकड़े टुकड़े चिल्लाता
तुम गीत कन्हैया गाते हो
तब भी बांटा अब बाँट रहे
बस तुमने कूटी है चांदी
तब के नेहरू अब के गाँधी
दोनों से पूछ रही आंधी
तब नेताजी या वल्लभ जी
अपने पद नहीं बचाए थे
जो हरदम उनसे कमतर थे
क्यूं शीर्ष उन्हें बिठ लाए थे
अब केसरी हो या नरसिम्हा
बस तुम काबिज़ हो जाते हो
फिर लोकतंत्र चिल्लाते हो
झूठे इतहास बनाते हो
तब भी चाटा अब चाट रहे
बस तुमने कूटी है चांदी
तब के नेहरू अब के गाँधी
दोनों से पूछ रही आंधी
बस तुमको समझ नहीं आए
गिलगिट बलूच तिब्बत सारे
जम्मू कश्मीर की धरती पर
क्यूं बोए थे तुमने अंगारे
तुम चापलूस ही रहे सदा
इस देश के नक्शे काट दिए
औरों ने सौंप दिया जीवन
और तुमने केवल ठाठ लिए
तब भी काटा अब काट रहे
बस तुमने कूटी है चांदी
तब के नेहरू अब के गाँधी
दोनों से पूछ रही आंधी