
पिता बरगद पिता अम्बर पिता पर्वत हिमालय है
पिता के पांव के नीचे सभी मंदिर शिवालय हैं
पिघलता था पिता तब ही रसोई मां की जलती थी
खिलाया उम्र भर सबको पिता वो भोजशाला है।।
पकड़ कर हाथ उसने राह पे चलना था सिखलाया
कहीं जब भीड़ को देखा हमें कंधों पे बिठलाया
थपेड़े सारे जीवन के अकेले खुद ही सहता जो
हमें सीने की गर्मी दी पिता वो योगशाला है।।
सलीके रोज़ सिखलाता तरीके साफ़ बतलाता
डगर सच्ची दिखाता वो कभी ना झूठ सिखलाता
हमारी कामयाबी की हर इक बुनियाद को रखता
नई उम्मीद को लिखता पिता वो पाठशाला है।।
उबलता जब किसी गलती पे अंदर से था घबराता
हमें जब चोट लगती थी वो भीतर तक दहल जाता
हमारी कामयाबी पे बड़ा ही छुुप के इठलाता
सदा विश्वास को बौता पिता वो पौध शाला है।।
कोई कितना बड़ा ही हो पिता को भूल ना जाना
ये वो ढलती इमारत जिससे तूने खुद को पहचाना
पिता वो फ़र्ज़ का दरिया हमेशा बहता ही रहता
जो दे परलोक से मंगल पिता वो यज्ञ शाला है।।