
राम इस देश की आस्था मात्र नहीं अपितु वे जन जन के हृदय में समाए प्राण हैं। हम सब राम को चाहते हैं परंतु क्या हमने कभी सोचा की हमारे राम हमसे क्या चाहते हैं। समय समय पर दिए गए उपदेशों एवं महापुरुषों के व्याख्यानों में क्या संदेश दिए गए हैं। मेरे अंतर्मन की पीड़ा और व्यथा ही है जो मैं अपनी इस छोटी सी रचना में आपको सादर समर्पित करना चाहता हूं। कृपया मेरे इस प्रयास को समझें एवं अन्यथा न लें।
धोती गई चोटी गई
जनेऊ तिलक गए
हाथ के कलावे अब
यदा कदा दीखते
पुरखों की बातें गई
रीतियां सौगातें गई कितने
भटक ऐसे राम नाम चीखते
उलट पलट खाते
कौन सा धर्म ध्याते
किसका चलन है ये
कौन राग पीटते
कितने हैं संस्कारी
धर्म के अनुचारी
कौन सी किताब पढ़
राम नाम लीकते
आंगन बुहारे बिना
स्वयं सुधारे बिना
धर्म रहेगा कहां
ज्ञानी जन खीझते
यज्ञ पुण्य सेवा दान
होवे बिना अभिमान
बिना धर्म स्वाभिमान
राम नही रीझते
राम राज चाहें सभी
राम काज नहीं कभी
घाट घाट दास दास
ज्ञान रहे बीजते मर्यादा को जगाओ
अपनी धारा में आओ
भूल जो गए हो क्यूं न
राम जी से टीपते
राम सा चलन पावें
राम पे मगन जावेें
कितने सजग मन राम नाम लीपते
धर्म चरित्र बचे
धरा ये पवित्र बचे
धर्म पताका बचे
राम रहें दिखते
पीढ़ियों का ज्ञान रहे
विधि का विधान रहे
ऋषियों का मान रहे
राम भी पसीजते
जाना उस पार जहां
राम जी सपरिवार
जो हैं राम जी के
वो तो राम जी से सीखते